धर्म

हुक्मनामा (सवेर)

श्री हरमंदिर साहिब

धनासरी महला ५ ॥ वडे वडे राजन अरु भूमन ता की त्रिसन न बूझी ॥ लपटि रहे माइआ रंग माते लोचन कछू न सूझी ॥१॥ बिखिआ महि किन ही त्रिपति न पाई ॥ जिउ पावकु ईधनि नही ध्रापै बिनु हरि कहा अघाई ॥ रहाउ ॥ दिनु दिनु करत भोजन बहु बिंजन ता की मिटै न भूखा ॥ उदमु करै सुआन की निआई चारे कुंटा घोखा ॥२॥ कामवंत कामी बहु नारी पर ग्रिह जोह न चूकै ॥ दिन प्रति करै करै पछुतापै सोग लोभ महि सूकै ॥३॥ हरि हरि नामु अपार अमोला अम्रितु एकु निधाना ॥ सूखु सहजु आनंदु संतन कै नानक गुर ते जाना ॥४॥६॥

अर्थ: (हे भाई! दुनिया में) बड़े बड़े राजे हैं, बड़े बड़े जिमींदार हैं, (माया के लिए) उनकी तृष्णा कभी भी खत्म नहीं होती, वह माया के अचंभों में मस्त रहते हैं, माया से चिपके रहते हैं। (माया के बिना) ओर कुछ उनको आँखों से दिखता ही नहीं ॥१॥ हे भाई! माया (के मोह) में (फंसे रह के) किसी मनुष्य ने माया की तृप्ति को प्राप्त नहीं किया है, जैसे आग को बालण देते जाओ वह तृप्त नहीं होती। परमात्मा के नाम के बिना मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो सकता ॥ रहाउ ॥ हे भाई! जो मनुष्य हर रोज़ स्वादले भोजन खाता रहता है, उस की (स्वादले भोजनों की) भूख कभी नहीं खत्म होती। (स्वादले भोजनों की खातिर) वह मनुष्य कुत्ते की तरह दौड़-भज करता है, चारों ओर ढूंढ़ता फिरता है ॥२॥ हे भाई! काम-वश हुए विशई मनुष्य की चाहे कितनी ही स्त्री हों, पराए घर की तरफ उस की मंदी निगाह फिर भी नहीं हटती। वह हर रोज़ (विशे-पाप करता है, और, पछतावा (भी) है। सो, इस काम-वाशना में और पछतावे में उस का आतमिक जीवन सुखता जाता है ॥३॥ हे भाई! परमात्मा का नाम ही एक ऐसा बेअंत और कीमती ख़ज़ाना है जो आतमिक जीवन देता है। (इस नाम-ख़ज़ाने की बरकत से) संत जनों के हृदय-घर में आतमिक अडोलता बनी रहती है, सुख आनंद बना रहता है। पर, हे नानक जी! गुरू पासों ही इस ख़ज़ाने की जान-पहचान प्राप्त होती है ॥४॥६॥

EDITED BY- HARLEEN KAUR

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