
बिलावलु महला ५ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सखी आउ सखी वसि आउ सखी असी पिर का मंगलु गावह ॥ तजि मानु सखी तजि मानु सखी मतु आपणे प्रीतम भावह ॥ तजि मानु मोहु बिकारु दूजा सेवि एकु निरंजनो ॥ लगु चरण सरण दइआल प्रीतम सगल दुरत बिखंडनो ॥ होइ दास दासी तजि उदासी बहुड़ि बिधी न धावा ॥ नानकु पइअ्मपै करहु किरपा तामि मंगलु गावा ॥१॥
अर्थ: हे सहेलिए! आओ (मिल के बैठें) हे सहेलिए! आओ प्रभु की रजा में चलें, और प्रभु-पति की महिमा का गीत गाएं। हे सहेलिए! (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर, शायद (इस तरह) हम अपने प्रीतम प्रभु को अच्छी लग सकें। हे सहेलिए! (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर, मोह दूर कर, माया के प्यार वाला विकार दूर कर, सिर्फ निर्लिप प्रभु की शरण पड़ी रह, सारे पापों के नाश करने वाले दया के श्रोत प्रीतम प्रभु के चरणों की औट पकड़े रख। नानक बिनती करता है: हे सहेलिए! (मेरे ऊपर भी) मेहर कर, मैं (प्रभु के) दासों की दासी बन के, (महिमा की ओर से) उपरामता त्याग के बार-बार और तरफ ना भटकता फिरूँ। (तू मेहर करे), तब ही मैं (भी) महिमा के गीत गा सकूँगा।1।
EDITED BY- HARLEEN KAUR




