
सलोक मः ३ ॥ कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥ मतु सेजै कंतु न आवई एवै बिरथा जाइ ॥ कामणि पिर मनु मानिआ तउ बणिआ सीगारु ॥ कीआ तउ परवाणु है जा सहु धरे पिआरु ॥ भउ सीगारु तबोल रसु भोजनु भाउ करेइ ॥ तनु मनु सउपे कंत कउ तउ नानक भोगु करेइ ॥१॥
हे स्त्री! तब सिंगार बना जब पहले तो अपने खसम को प्रसन्न कर ले , (नहीं तो) शायद खसम आये ही न और सिंगार व्यर्थ ही चल जाए। हे स्त्री! जो शास्म का मन मान जात तो ही सिंगार बना समझ। स्त्री का सिंगार किया हुआ तो ही कबूल है अगर खसम उस को प्यार करे। जो जीव स्त्री प्रभु के डर (में रहने) को सिंगार और पहनने का रस बनाती है, प्रभु के प्यार को भोजन (भावार्थ, जिन्दगी का आधार) बनाती है, तो अपना तन मन खसम-प्रभु के हवाले कर देती है (भावार्थ, पूर्ण रूप से प्रभु की रजा में चलती है) तो हे नानक! उस को खसम प्रभु मिलता है॥
EDITED BY- HARLEEN KAUR




