धर्म

हुक्मनामा (सवेर)

श्री हरमंदिर साहिब

आसा स्री कबीर जीउ के दुपदे    ੴ सतिगुर प्रसादि ॥   हीरै हीरा बेधि पवन मनु सहजे रहिआ समाई ॥   सगल जोति इनि हीरै बेधी सतिगुर बचनी मै पाई ॥१॥  हरि की कथा अनाहद बानी ॥   हंसु हुइ हीरा लेइ पछानी ॥१॥ रहाउ ॥  कहि कबीर हीरा अस देखिओ जग मह रहा समाई ॥   गुपता हीरा प्रगट भइओ जब गुर गम दीआ दिखाई ॥२॥१॥३१॥

राग आसा में भगत कबीर जी की दो बंदो वाली बाणी। अकाल पुरख एक है और सतगुरु की कृपा द्वारा मिलता है। जब (जीव-) हीरा (प्रभु-) हीरे को छेद लेता है (भावार्थ, जब जीव परमात्मा के चरणों में सुरत जोड़ लेता है) तो इस का चंचल मन अडोल अवस्था में सदा टिका रहता है। यह प्रभु-हीरा ऐसा है जो सारे जीव-जन्तों में मौजूद है-यह बात मैने सतगुरु के उपदेश की बरकत से समझी है।१। प्रभु की सिफत-सलाह से और एक-रस गुरु की बाणी में जुड़ के जो जीव हंस बन जाता है वह प्रभु हीरे को पहचान लेता है ( जैसे हंस मोती पहचान लेता है)।१।रहाउ। कबीर जी कहते हैं जो प्रभु-हीरा सारे जगत में व्यापक है, जब उस तक पहुँच वाले सतगुरु ने मुझे उस का दीदार करवाया, तो मैने वह हीरा (अपने अंदर ही) देख लिया, वह छुपा हुआ हीरा (मेरे अंदर ही) प्रतक्ष हो गया।२।१।३१।

EDITED BY- HARLEEN KAUR

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