धर्म

हुक्मनामा (सवेर)

श्री हरमंदिर साहिब

सोरठि महला १ ॥ तू प्रभ दाता दानि मति पूरा हम थारे भेखारी जीउ ॥ मै किआ मागउ किछु थिरु न रहाई हरि दीजै नामु पिआरी जीउ ॥१॥ घटि घटि रवि रहिआ बनवारी ॥ जलि थलि महीअलि गुपतो वरतै गुर सबदी देखि निहारी जीउ ॥ रहाउ ॥ मरत पइआल अकासु दिखाइओ गुरि सतिगुरि किरपा धारी जीउ ॥ सो ब्रहमु अजोनी है भी होनी घट भीतरि देखु मुरारी जीउ ॥२॥ जनम मरन कउ इहु जगु बपड़ो इनि दूजै भगति विसारी जीउ ॥ सतिगुरु मिलै त गुरमति पाईऐ साकत बाजी हारी जीउ ॥३॥ सतिगुर बंधन तोड़ि निरारे बहुड़ि न गरभ मझारी जीउ ॥ नानक गिआन रतनु परगासिआ हरि मनि वसिआ निरंकारी जीउ ॥४॥८॥

अर्थ: हे प्रभू जी! तू हमें सब पदार्थ देने वाला है, दातें देने में तू कभी चूकता नहीं, हम तेरे (दर के) मंगते हैं। मैं तुझ से कौन सी चीज माँगू? कोई भी चीज सदा टिकी नहीं रहने वाली। (हाँ, तेरा नाम ही है जो सदा स्थिर रहने वाला है। इसलिए) हे हरी! मुझे अपना नाम दे, मैं तेरे नाम को प्यार करूँ।1। परमात्मा हरेक शरीर में व्यापक है। पानी में, धरती में, धरती पर, आकाश में हर जगह मौजूद है पर छुपा हुआ है। (हे मन!) गुरू के शबद के माध्यम से उसे देख। रहाउ। (हे भाई! जिस मनुष्य पर) गुरू ने सतिगुरू ने कृपा की उसको उसने धरती आकाश पाताल (सारा जगत ही परमात्मा के अस्तित्व से भरपूर) दिखा दिया। वह परमात्मा जूनियों में नहीं आता, अब भी मौजूद है, आगे भी मौजूद रहेगा, (हे भाई!) उस प्रभू को तू अपने दिल में बसता देख।2। ये भाग्यहीन जगत जनम-मरण का चक्कर सहेड़े बैठा है क्योंकि इसने माया के मोह में पड़ कर परमात्मा की भक्ति भुला दी है। अगर सतिगुरू मिल जाए तो गुरू के उपदेश में चलने से (प्रभू की भक्ति) प्राप्त होती है, पर माया-ग्रसित जीव (भक्ति से टूट के मानस जन्म की) बाजी हार जाते हैं।3। हे सतिगुरू! माया के बँधन तोड़ के जिन लोगों को तू माया से निर्लिप कर देता है, वह दुबारा जनम-मरन के चक्कर में नहीं पड़ता। हे नानक! (गुरू की कृपा से जिनके अंदर परमात्मा के) ज्ञान का रतन चमक पड़ता है, उनके मन में हरी निरंकार (स्वयं) आ बसता है।4।9।

EDITED BY- HARLEEN KAUR

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