धर्म

हुक्मनामा (सवेर)

श्री हरमंदिर साहिब

सोरठि महला ४ ॥ हरि सिउ प्रीति अंतरु मनु बेधिआ हरि बिनु रहणु न जाई ॥ जिउ मछुली बिनु नीरै बिनसै तिउ नामै बिनु मरि जाई ॥१॥ मेरे प्रभ किरपा जलु देवहु हरि नाई ॥ हउ अंतरि नामु मंगा दिनु राती नामे ही सांति पाई ॥ रहाउ ॥ जिउ चात्रिकु जल बिनु बिललावै बिनु जल पिआस न जाई ॥ गुरमुखि जलु पावै सुख सहजे हरिआ भाइ सुभाई ॥२॥ मनमुख भूखे दह दिस डोलहि बिनु नावै दुखु पाई ॥ जनमि मरै फिरि जोनी आवै दरगहि मिलै सजाई ॥३॥ क्रिपा करहि ता हरि गुण गावह हरि रसु अंतरि पाई ॥ नानक दीन दइआल भए है त्रिसना सबदि बुझाई ॥४॥८॥

हे भाई! परमात्मा से प्यार के द्वारा जिस मनुख का हृदय जिस मनुख का मन भीग जाता है, वह परमात्मा (की याद) के बिना रह नहीं सकता। जैसे पानी के बिना मछली मर जाती है, उसी प्रकार मनुख प्रभु के नाम के बिना अपनी आत्मिक मौत आ गयी समझता है॥१॥ हे मेरे प्रभु! (मुझे अपनी) कृपा का जल दे। हे हरी! मुझे अपनी सिफत-सलाह की दात दे। मैं अपने हृदय में दिन रात तेरा नाम (ही) मांगता हूँ, (क्योंकि तेरे) नाम में जुड़ने से ही आत्मिक ठंडक प्राप्त हो सकती है॥रहाउ॥ हे भाई! जैसे वर्षा-जल के बिना पपीहा बिलकता है, वर्षा की बूँद के बिना उस की प्यास नहीं मिटती, उसी प्रकार जो मनुख गुरु की सरन आता है, तब वह प्रभु की बरकत से आत्मिक जीवन वाला बनता है, जब वह आत्मिक अडोलता में टिक के आत्मिक आनंद देने वाला नाम-जल (गुरु पास से) प्राप्त करता है॥२॥ हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया की भूख के मारे हुए दसो-दिशाओं में डोलते फिरते हैं। मन का मुरीद मनुष्य परमात्मा के नाम से टूट के दुख पाता रहता है। वह पैदा होता है मरता है, बार-बार जूनियों में पड़ा रहता है, परमात्मा की दरगाह में उसको (ये) सजा मिलती है।३। हे हरि! अगर तू (स्वयं) मेहर करे, तो ही हम जीव तेरी महिमा के गीत गा सकते हैं। (जिस पर मेहर हो, वही मनुष्य) अपने हृदय में हरि नाम का स्वाद अनुभव करता है। हे नानक! दीनों पर दया करने वाला प्रभु जिस मनुष्य पर प्रसन्न होता है, गुरु के शब्द के द्वारा उसकी (माया की) प्यास बुझा देता है।४।८।

EDITED BY- HARLEEN KAUR

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