धर्म

हुक्मनामा (सवेर)

श्री हरमंदिर साहिब

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही बाणी सेख फरीद जी की ॥ तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ ॥ बावलि होई सो सहु लोरउ ॥ तै सहि मन महि कीआ रोसु ॥ मुझु अवगन सह नाही दोसु ॥१॥ तै साहिब की मै सार न जानी ॥ जोबनु खोइ पाछै पछुतानी ॥१॥ रहाउ ॥ काली कोइल तू कित गुन काली ॥ अपने प्रीतम के हउ बिरहै जाली ॥ पिरहि बिहून कतहि सुखु पाए ॥ जा होइ क्रिपालु ता प्रभू मिलाए ॥२॥ विधण खूही मुंध इकेली ॥ ना को साथी ना को बेली ॥ करि किरपा प्रभि साधसंगि मेली ॥ जा फिरि देखा ता मेरा अलहु बेली ॥३॥ वाट हमारी खरी उडीणी ॥ खंनिअहु तिखी बहुतु पिईणी ॥ उसु ऊपरि है मारगु मेरा ॥ सेख फरीदा पंथु सम्हारि सवेरा ॥४॥१॥

अर्थ: हे मेरे मालिक! मैंने तेरी कद्र नहीं जानी, जवानी का समय गवा के अब बाद में मैं झुर रही हूँ।1। रहाउ। बड़ी दुखी हो के, बड़ी तड़फ के अब मैं हाथ मल रही हूँ, पागल हो के अब मैं उस पति को तलाशती फिरती हूँ। हे पति प्रभू! तेरा कोई दोष (मेरी इस बुरी हालत के लिए) नहीं है, मेरे में ही अवगुण थे, तभी तूने अपने मन में मेरे साथ रोष किया।1। (अब मैं कोयल को पूछती फिरती हूँ-) हे काली कोयल! (भला, मैं तो अपने कर्मों की मारी दुखी जली सड़ी हुई हूँ) तू भी क्यों काली (हो गई) है? (कोयल भी यही उक्तर देती है) मुझे मेरे प्रीतम के विछोड़े ने जला डाला है। (ठीक है) पति से विछुड़ के कहीं कोई सुख पा सकी है? (पर, जीव-स्त्री के वश की भी बात नहीं) जब प्रभू खुद मेहरवान होता है तो खुद ही मिला लेता है।2। (इस जगत रूप) डरावने कूएं में मैं जीव-स्त्री अकेली (गिर गई थी, यहाँ) कोई मेरा साथी नहीं (मेरे दुखों में) कोई मेरा मददगार नहीं। अब जब प्रभू ने मेहर करके मुझे सत्संग में मिलाया है, (सत्संग में आ के) जब मैं देखती हूँ तो मुझे मेरा रॅब बेली दिख रहा है।3। हे भाई! हमारा यह जीवन-पथ बहुत भयावह है, खंडे से भी तीखा है, बड़ी तेज धार वाला है; इसके ऊपर से हमें गुजरना है। इस वास्ते, हे फरीद! सुबह-सुबह रास्ता संभाल।4।1।

EDITED BY- HARLEEN KAUR

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