
बिलावलु महला ४ ॥ खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु को जापै हरि मंत्रु जपैनी ॥ गुरु सतिगुरु पारब्रहमु करि पूजहु नित सेवहु दिनसु सभ रैनी ॥१॥ हरि जन देखहु सतिगुरु नैनी ॥ जो इछहु सोई फलु पावहु हरि बोलहु गुरमति बैनी ॥१॥ रहाउ ॥ अनिक उपाव चितवीअहि बहुतेरे सा होवै जि बात होवैनी ॥ अपना भला सभु कोई बाछै सो करे जि मेरै चिति न चितैनी ॥२॥ मन की मति तिआगहु हरि जन एहा बात कठैनी ॥ अनदिनु हरि हरि नामु धिआवहु गुर सतिगुर की मति लैनी ॥३॥ मति सुमति तेरै वसि सुआमी हम जंत तू पुरखु जंतैनी ॥ जन नानक के प्रभ करते सुआमी जिउ भावै तिवै बुलैनी ॥४॥५॥
अर्थ: हे प्रभू के सेवक जनो! गुरू को आँखें खोल के देखो (गुरू पारब्रहम का रूप है)। गुरू की दी हुई मति पर चल कर परमात्मा के सिफत सालाह के वचन बोलो, जो इच्छा करोगे वही फॅल प्राप्त कर लोगे।1। रहाउ। कोई खत्री हो, चाहे ब्राहमण हो, कोई शूद्र हो चाहे वैश हो, हरेक (श्रेणी का) मनुष्य प्रभू का नाम-मंत्र जप सकता है (ये सबके लिए) जपने-योग्य है। हे हरी जनो! गुरू को परमात्मा का रूप जान के गुरू की शरण पड़ो। दिन-रात हर वक्त गुरू की शरण पड़े रहो।1। (गुरू परमेश्वर का आसरा-सहारा भुला के अपनी भलाई के) अनेकों और बहुत सारे ढंग सोचे जाते हैं, पर बात वही होती है जो (रजा के अनुसार) जरूर होनी होती है। हरेक जीव अपना भला चाहता है, पर प्रभू वह काम कर देता है जो मेरे आपके चिक्त में भी नहीं होता।2। हे संतजनो! अपने मन की मर्जी (पर चलना) छोड़ दो (गुरू के हुकम में चलो), पर ये बात है बहुत मुश्किल। (फिर भी) गुरू पातशाह की मति ले के हर वक्त परमात्मा का नाम जपा करो।3। हे मालिक प्रभू! अच्छी-बुरी मति तेरे अपने वश में है (तेरी प्रेरणा के अनुसार ही कोई जीव भले राह पर चलता है और कोई बुरे राह पर), हम तो तेरे बाजे (साज) हैं, तू हमें बजाने वाला सबमें बसने वाला प्रभू है। हे दास नानक के मालिक प्रभू करतार! जैसे तुझे अच्छा लगता है वैसे ही तू हमें बुलाता है (हमारे मुँह से बोल निकलवाता है)।4।5।
EDITED BY- HARLEEN KAUR




