
सलोकु मः ३ ॥ भरमि भुलाई सभु जगु फिरी फावी होई भालि ॥ सो सहु सांति न देवई किआ चलै तिसु नालि ॥ गुर परसादी हरि धिआईऐ अंतरि रखीऐ उर धारि ॥ नानक घरि बैठिआ सहु पाइआ जा किरपा कीती करतारि ॥१॥ मः ३ ॥ धंधा धावत दिनु गइआ रैणि गवाई सोइ ॥ कूड़ु बोलि बिखु खाइआ मनमुखि चलिआ रोइ ॥ सिरै उपरि जम डंडु है दूजै भाइ पति खोइ ॥ हरि नामु कदे न चेतिओ फिरि आवण जाणा होइ ॥ गुर परसादी हरि मनि वसै जम डंडु न लागै कोइ ॥ नानक सहजे मिलि रहै करमि परापति होइ ॥२॥
अर्थ :-भ्रम में भुली हुई मैं (परमात्मा को खोजने के लिए) सारा जगत विचरी और ढूंढ ढूंढ के खप गई, (पर इस तरह) वह खसम (भगवान) (हृदय में) शांती नहीं देता, उस के साथ कोई जोर नहीं चल सकता। (पर, हाँ) सतिगुरु की कृपा के साथ भगवान सुमिरा जा सकता है और हृदय के अंदर रखा जा सकता है। हे नानक ! (गुरु की कृपा के साथ) मैंने घर में बैठने से खसम खोज लिया जब करतार ने (मेरे ऊपर) कृपा की (और गुरु मिलाया)।1। जो मनुख अपने मन के पिछे चलता है उस का (सारा) दिन (दुनिया के) धंधों में भटकते हुए बीत जाता है, और रात को वह सौं के गंवा लेता है, (इन धंधों में पड़ा हुआ) झूठ बोल के ज़हर खाता है (भावार्थ, दुनिया के पदार्थ मानता है) और (अंत को यहाँ से) रो के चल पड़ता है; उस के सिर ऊपर मौत का डंडा (तैयार रहता) है, (भावार्थ, हर समय मौत से डरता है), (भगवान को विसार के) ओर में प्यार के कारण (अपनी) इज्ज़त गंवा लेता है; उस ने परमात्मा का नाम तो कभी याद नहीं किया होता (इस लिए) बार बार जन्म मरन का गेड़ (उस को नसीब) होता है। (पर जिस मनुख के) मन में सतिगुरु की कृपा के साथ परमात्मा बसता है उस को कोई मौत का डंडा नहीं लगता (भावार्थ, उस को मौत डरा नहीं सकती) हे नानक ! वह अडोल अवस्था में टिका रहता है (यह अवस्था उस को) परमात्मा की कृपा के साथ मिल जाती है।2।
EDITED BY- HARLEEN KAUR




