धर्म

हुक्मनामा (सवेर)

श्री हरमंदिर साहिब

सोरठि महला ५ ॥ ठाढि पाई करतारे ॥ तापु छोडि गइआ परवारे ॥ गुरि पूरै है राखी ॥ सरणि सचे की ताकी ॥१॥ परमेसरु आपि होआ रखवाला ॥ सांति सहज सुख खिन महि उपजे मनु होआ सदा सुखाला ॥ रहाउ ॥ हरि हरि नामु दीओ दारू ॥ तिनि सगला रोगु बिदारू ॥ अपणी किरपा धारी ॥ तिनि सगली बात सवारी ॥२॥ प्रभि अपना बिरदु समारिआ ॥ हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥ गुर का सबदु भइओ साखी ॥ तिनि सगली लाज राखी ॥३॥ बोलाइआ बोली तेरा ॥ तू साहिबु गुणी गहेरा ॥ जपि नानक नामु सचु साखी ॥ अपुने दास की पैज राखी ॥४॥६॥५६॥

अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य के अंदर करतार ने ठंड डाल दी, उस के परिवार को (उस के ज्ञान-इन्द्रयाँ को विकारों का) ताप छोड़ जाता है। हे भाई! पूरे गुरू ने जिस मनुष्य की मदद की है, उस ने सदा कायम रहने वाले परमात्मा का सहारा ले लिया ॥१॥ हे भाई! जिस मनुष्य का रक्षक परमात्मा आप बन जाता है, उस का मन सदा के लिए सुखी हो जाता है (क्योंकि उस के अंदर) एक पल में आत्मिक अडोलता के सुख और शांति पैदा हो जाते हैं ॥ रहाउ ॥ हे भाई! (विकार- रोगों का इलाज करने के लिए गुरू ने जिस मनुष्य को) परमात्मा की नाम-दवाई दी, उस (नाम-दारू) ने उस मनुष्य का सारा ही (विकार-) रोग काट दिया। जब प्रभू ने उस मनुष्य पर अपनी मेहर की, तो उस ने अपनी सारी जीवन-कहानी ही सुंदर बना ली (अपना सारा जीवन संवार लिया) ॥२॥ हे भाई! प्रभू ने (सदा ही) अपने (प्यार वाले) स्वभाव को याद रखा है। वह हमारे जीवों का कोई गुण या औगुण दिल पर लगा नहीं रखता। (प्रभू की कृपा से जिस मनुष्य के अंदर) गुरू के श़ब्द ने अपना प्रभाव पाया, श़ब्द ने उस की सारी इज़्ज़त रख ली (उस को विकारों में फंसने से बचा लिया) ॥३॥ हे प्रभू! जब तूँ प्रेरणा देता हैं तब ही मैं तेरी सिफ़त-सलाह कर सकता हूँ। तूँ हमारा मालिक हैं, तूँ गुणों का ख़ज़ाना हैं, तूँ गहरे जिगरे वाला हैं। हे नानक जी! सदा-थिर प्रभू का नाम जपा कर, यही सदा साथ निभाने वाला है। प्रभू अपने सेवक की (सदा) इज़्ज़त रखता आया है ॥४॥६॥५६॥

 

EDITED BY- HARLEEN KAUR

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!