धर्म

हुक्मनामा (सवेर)

श्री हरमंदिर साहिब

रागु वडहंसु महला ५ छंत घरु ४ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ गुर मिलि लधा जी रामु पिआरा राम ॥ इहु तनु मनु दितड़ा वारो वारा राम ॥ तनु मनु दिता भवजलु जिता चूकी कांणि जमाणी ॥ असथिरु थीआ अम्रितु पीआ रहिआ आवण जाणी ॥ सो घरु लधा सहजि समधा हरि का नामु अधारा ॥ कहु नानक सुखि माणे रलीआं गुर पूरे कंउ नमसकारा ॥१॥

राग वडहंस, घर ४ में गुरु अर्जनदेव जी की बानी ‘छंत’ अकाल पुरख एक है और सतगुरु की कृपा द्वारा मिलता है। हे भाई! गुरु को मिल कर (ही) प्यारा प्रभु प्राप्त होता है, (जिस को गुरु के द्वारा प्रभु मिल जाता है, वह) अपना यह तन यह मन (गुरु के) हवाले करता है। जो मनुख अपना तन मन गुरु के हवाले करता है, वह संसार-सागर को जीत लेता है, उस की जम्दूतों की मोहताजी ख़तम हो जाती है, वह मनुख आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (गुरु से ले के) पिता है, और, सथिर-मन हो जाता है, उस के जनम मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। उस मनुख को उस घर (गुरु के चरणों में) टिकाना मिल जाता है (जिस की बरकत से) वह आत्मिक अड़ोलता में लीं रहता है, परमात्मा का नाम (उस की जिन्दगी का आसरा बन जाता है। हे नानक! (कह) वह मनुख सुख में रह कर आत्मिक खुशियाँ मनाता है (यह साडी बरकत गुरु की ही है) पूरे गुरु को (सदा) नमस्कार करनी चाहिये।१।

EDITED BY- HARLEEN KAUR

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