धर्म

हुक्मनामा (सवेर)

श्री हरमंदिर साहिब

बिलावलु महला ५ ॥ मात पिता सुत साथि न माइआ ॥ साधसंगि सभु दूखु मिटाइआ ॥१॥ रवि रहिआ प्रभु सभ महि आपे ॥ हरि जपु रसना दुखु न विआपे ॥१॥ रहाउ ॥ तिखा भूख बहु तपति विआपिआ ॥ सीतल भए हरि हरि जसु जापिआ ॥२॥ कोटि जतन संतोखु न पाइआ ॥ मनु त्रिपताना हरि गुण गाइआ ॥३॥ देहु भगति प्रभ अंतरजामी ॥ नानक की बेनंती सुआमी ॥४॥५॥१०॥

हे भाई! माँ, बाप, पुत्र, माया-(इन सब में से कोई भी जीव का सदा के लिए)साथ नहीं बन सकता, (दुःख आने पर भी सहाई नहीं बन सकता)। गुरु की सांगत में टिकाव कर के सारा दुःख-कलेश दूर कर सकतें हैं॥१॥ हेई भाई!(जो ) परमात्मा खुद ही सब जीवों में व्यापक है, उस(के नाम) का जाप जिव्हा से करता रह, इस प्रकार कोई दुःख जोर नहीं पकड़ सकता॥१॥रहाउ॥ हे भाई! जगत माया की तृष्णा, माया की भूख और सडन में फसा पड़ा है। जो मनुख परमात्मा की सिफत-सलाह करते है, (उनके हृदये) ठन्डे ठार हो जाते हैं॥२॥ हे भाई! करोड़ों यत्न करने से भी (माया की तृष्णा) से संतुष्टि नहीं पाई जा सकती। प्रभु की महिमा करने से मन तृप्त हो जाता है।੩। हे हरेक के दिल की जानने वाले प्रभु! (तेरे दास) नानक की (तेरे दर पे) विनती है कि अपनी भक्ति का दान दे।੪।੫।੧੦।

EDITED  BY- HARLEEN KAUR

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!