धर्म

हुक्मनामा (सवेर)

श्री हरमंदिर साहिब

सोरठि महला ५ घरु २ दुपदे ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥ ऊच नीच महि जोति समाणी घटि घटि माधउ जीआ ॥१॥ संतहु घटि घटि रहिआ समाहिओ ॥ पूरन पूरि रहिओ सरब महि जलि थलि रमईआ आहिओ ॥१॥ रहाउ ॥ गुण निधान नानकु जसु गावै सतिगुरि भरमु चुकाइओ ॥ सरब निवासी सदा अलेपा सभ महि रहिआ समाइओ ॥२॥१॥२९॥

हे भाई! जैसे सब जड़ी बूटियों मैं अग्नि (गुप्त मौजूद) है, जैसे हरेक किसम के दूध में घी (माखन) गुप्त मौजूद है, उसी प्रकार अच्छे बुरे सब जीवों में प्रभु ज्योति समाई हुई है, परमात्मा हरेक सरीर में है, सब जीवों में है।१। हे संत जानो! परमात्मा हरेक सरीर में मौजूद है। वेह पूरी तरह सारे जीवों में वेयापक है, वेह सुंदर राम पानी में है, धरती में है।१।रहाउ। हे भाई! नानक (उस) गुणों के खजाने परमात्मा की सिफत-सलाह का गीत गाता है। गुरु ने (नानक का) भ्रम दूर कर दिया है। (तभी नानक को यकीन है कि) परमात्मा सब जीवों में बस्ता है (फिर भी) सदा (माया के मोह से) निरलेप है, सब जीवों में समा रहा है॥2॥1॥2॥

EDITED BY- HARLEEN KAUR

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