धर्म

हुक्मनामा (सवेर)

श्री हरमंदिर साहिब

सूही महला ४ ॥ हरि हरि नामु भजिओ पुरखोतमु सभि बिनसे दालद दलघा ॥ भउ जनम मरणा मेटिओ गुर सबदी हरि असथिरु सेवि सुखि समघा ॥१॥ मेरे मन भजु राम नाम अति पिरघा ॥ मै मनु तनु अरपि धरिओ गुर आगै सिरु वेचि लीओ मुलि महघा ॥१॥ रहाउ ॥ नरपति राजे रंग रस माणहि बिनु नावै पकड़ि खड़े सभि कलघा ॥ धरम राइ सिरि डंडु लगाना फिरि पछुताने हथ फलघा ॥२॥ हरि राखु राखु जन किरम तुमारे सरणागति पुरख प्रतिपलघा ॥ दरसनु संत देहु सुखु पावै प्रभ लोच पूरि जनु तुमघा ॥३॥ तुम समरथ पुरख वडे प्रभ सुआमी मो कउ कीजै दानु हरि निमघा ॥ जन नानक नामु मिलै सुखु पावै हम नाम विटहु सद घुमघा ॥४॥२॥

हे भाई! जिस मनुख ने परमात्मा का नाम भजा है, हरी उत्तम पुरख को जपा है, उस के सरे दरिद्र, दलों के दल नास हो गये हैं। गुरु के शब्द में जुड़ के उस मनुख ने जनम मरण का डर भी ख़तम कर लिया है। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की सेवा-भागती कर के वेह आनंद में लीं हो गया है।१। हे मेरे मन! सादे प्रमाता का अति प्यारा नाम सुमिरा कर। हे भाई! मैने अपना मन अपना सरीर भेट कर के गुरु के आगे रख दिया है। में अपना सिर मंहगे भाव बेच दिया है (मेना सिर के बदले कीमती हरी नाम ले लिया है)।१।रहाउ। हे भाई! दुनिया के राजे-महाराजे (माया के) रंग-रस भोगते रहते हैं, उन सबको आत्मिक मौत पकड़ कर आगे लगा लेती है। जब उन्हें किए कर्मों का फल मिलता है, जब उनके सिर पर परमात्मा का डंडा बजता है, तब पछताते हैं।2। हे हरी! हे पालनहार सर्व-व्यापक! हम तेरे (पैदा किए हुए) निमाणे से जीव हैं, हम तेरी शरण आए हैं, तू खुद (अपने) सेवकों की रक्षा कर। हे प्रभू! मैं तेरा दास हूँ, दास की तमन्ना पूरी कर, इस दास को संत जनों की संगति बख्श (ता कि ये दास) आत्मिक आनंद प्राप्त कर सके।3। हे प्रभू! हे सबसे बड़े मालिक! तू सारी ताकतों का मालिक पुरुख है। मुझे एक छिन के वास्ते ही अपने नाम का दान दे। हे दास नानक! (कह–) जिसको प्रभू का नाम प्राप्त होता है, वह आनंद लेता है। मैं सदा हरी-नाम से सदके हूँ।4।2।

EDITED BY- HARLEEN KAUR

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