
गूजरी महला १ ॥ नाभि कमल ते ब्रहमा उपजे बेद पड़हि मुखि कंठि सवारि ॥ ता को अंतु न जाई लखणा आवत जात रहै गुबारि ॥१॥ प्रीतम किउ बिसरहि मेरे प्राण अधार ॥ जा की भगति करहि जन पूरे मुनि जन सेवहि गुर वीचारि ॥१॥ रहाउ ॥ रवि ससि दीपक जा के त्रिभवणि एका जोति मुरारि ॥ गुरमुखि होइ सु अहिनिसि निरमलु मनमुखि रैणि अंधारि ॥२॥
(पुरान ग्रंथों में कथा आती है की जिस ब्रह्मा के रचे हुए) वेद (पंडित लोग) मुख से गले से मीठे स्वर में प्रतिदिन पड़ते हैं, वह ब्रह्मा विष्णु की धुन्नी में से उगे हुए कमल की नाल से पैदा हुआ, (और अपने जन्म-दाते की कुदरत का अंत पाने के लिए उसी में चल पड़ा, कई युग उस नाल के) अँधेरे में आता जाता रहा, परन्तु उस का अंत न पा सका॥१॥ हे मेरी जिन्दगी के सहारे प्रीतम! मुझे न भूल। तूं वो है जिस की भक्ति पूरण पुरख सदा करते रहते हैं, जिस को ऋषि मुनि गुरु की बताई सूझ के सहारे सदा सिमरते है॥१॥रहाउ॥ वह प्रभु इतना बड़ा है की सूरज और चंद्रमा उस के त्रिभ्वनी जगत में (मानो नन्हे से) दीपक (ही) हैं, सारे जगत में उस की जोत व्यपाक है। जो मनुख गुरु के बताये हुए राह पर चल के उस को दिन रात मिलता है वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है। जो मनुख अपने मन के पीछे चलता है उस की जिन्दगी की रात (अज्ञानता के) अन्धकार में बीतती है॥२॥
EDITED BY- HARLEEN KAUR




